Thursday, February 7, 2019

प्रियतम

गुलों की ए फ़िजा बोलो तुम्हें किसने तो है भेजा,
कहा किसने संदेशा ये मेरे प्रियतम तक ले जा,
ये तेरी गुमसुदी मुझको हर घड़ी है रही तड़पा,
संदेशा है जो प्रियतम का वो सच-सच है मुझे कह जा।

फ़िज़ाओं के तो पीछे ही आ रहा कारवाँ देखा,
किसी के आज आदर में झुका वो आसमाँ देखा,
दिशायें आज तो चारों मिल रहीं एक में मानो,
जब प्रियतम को मैंने तो तिरंगे में लिपटा देखा।

                                  -अनुराधा यादव

Wednesday, February 6, 2019

ज़माना

फूंकती थी एक दिन माँ,
फूंकनी से चूल्हा,
बिना थके हर दिन में,
वो काम करती पूरा,
हर रोज तो सुबह उठ के,
पीसती चक्की से चून,
चाहे दिसम्बर जनवरी हो,
या हो महीना जून,
मेहमान देवता समान था तब,
अजनबियों का भी सम्मान था तब,
प्रेम और सौहार्द से,
जीवन परिपूर्ण था,
प्राणी मात्र की सेवा में ही,
जीवन सम्पूर्ण था,
हर व्यक्ति तब श्रमशील था,
उस समय का मानव पुरुषार्थी बलवीर था,
पर आज के समाज की,
परिस्थिति कुछ और है,
समाज में तो स्वार्थता है,
सदाचार तो गौण है,
चूल्हे का स्थान,
गैस सिलेंडर ने ले लिया,
लगभग हर काम घर का,
मशीनों पर निर्भर हुआ,
सम्मान अजनबियों का क्या,
अपनों के लिये समय नहीं,
समन्वय और सहयोग की,
अब जीवन में जगह नहीं।

              -अनुराधा यादव

Tuesday, February 5, 2019

प्राण वायु

जिसकी है हरदम जरूरत,
इस मुदित संसार में,
जो मदद करती हमारी,
रक्त के संचार में,
वो प्राण वायु व्याप्त है,
इस समूचे संसार में,
वो हमारी देह को,
शक्तियों से भरती है,
हमको तो सारे दोषों,
से दूर रखती है,
पर आज के संसार में,
प्राण वायु की कमी हुई,
जो शेष रह गई है,
वो अशुद्धता में दबी हुई,
त्राण करती थी प्राण का,
वो आज जीवन है छींनती,
हर जीव के शरीर को,
रोगों से है बींधती,
इस वायु की अशुद्धता का,
कारण बस मानव है,
पूर्ण करने को अपनी जरूरत,
वो बन गया आज दानव है,
मनुष्य अपनी स्वार्थता में,
इतना तो अंधा है,
वो प्रकृति को नष्ट करना,
मानता तो धंधा है।

               -अनुराधा यादव
             

Monday, February 4, 2019

रुई का ढेर

ये ढेर रुई का आसमान में कहाँ से आया,
इतना बड़ा ढेर तो किसने यहाँ लगाया,

मानो गिरि ये बना हुआ है,
आसमान में खड़ा हुआ है,

ये गद्दे जैसा मखमली,
कोमलता अपने में रख ली,

सूरज भी तो दुबक गया है,
इस रुई के ढेर में गुम गया है,

कोई खेल ये ढेर खेल रहा है,
मन मस्त मगन हो विचर रहा है,

तभी आसमान से बूंदे आईं,
मुझे लगा, बूँदों ने की कोई लरिकाईं,

लेकिन जब बूंदों को गिरते देर हो गई,
पानी से जब गली भर गई,

तब दादा जी ने समझाया,
ये तो बादल था, जिसने पानी बरसाया।

                         -अनुराधा यादव

Sunday, February 3, 2019

हिमालय

अचल स्थिर वो खड़ा है,
जगत में सबसे बड़ा है,

सुनती हूँ पृथ्वी से उसकी दास्तां को,
चोटियां तो छू रहीं हैं आसमां को,

वस्त्र धारण हैं किए उसने धवल,
लगता है अभी-अभी पहने नवल,

आदित्य अपनी रश्मियां बिखेरता है जब,
श्रृंगार ये तो करता है रश्मियों से तब,

चंद्रमा की चांदनी बढ़ती है इसकी धवलता,
तब इसके सौंदर्य की बढ़ती है प्रबलता,

संसार में इस दृश्य की ,
कोई जगह है ना मिली,

गंगा का निर्माण कर्ता,
पालनपोषण वो ही करता,

अपने में वृद्धि करना जिसका तो काम है,
सुदृश्य, कर्णप्रिय है जो हिमालय उसका नाम है।

                          -अनुराधा यादव

Saturday, February 2, 2019

मानव

संसार के संजाल में,
मानव घिरा हर हाल में,

हैं यहाँ सब एक जैसे,
फिर भी छोटे बड़े हैं साक में,

यहां लाखों करोड़ो जीव है
पर मनुज उत्कृष्ट बुद्धि,है आगे उत्पात में,

उसका हर जीव पर तो है नियंत्रण,
पर मानव का मन नहीं है हाथ में,

प्रकृति जो पालन कर्ता,डर नहीं है उसे,
इसके साथ करने खिलवाड़ में,

प्रकृति के चक्षुओं से अश्रु धारा बह रही,
नष्ट मेरे होने से तू रहेगा किस हाल में,

पर मनुज न समझे,
न कमी कर रहा अपनी चाल में,

संसार के संजाल में ,
मानव घिरा हर हाल में।

              -अनुराधा यादव

Friday, February 1, 2019

गीत गुनगुनाएं

आओ सभी हम मिलकर यही गीत गुनगुनाएं,
स्वरूप जिंदगी का हम प्रेम से सजाएं,
प्रभात हर किसी का आशामयी बनाएं,
हर शाम को तो हम खुशियों की समां जलाएं,
गर कोई है दुखी तो उसे ढाँढस बंधाये,
आंसू तो उसके पोंछ कर मानवता दिखाएं,
रूढ़िवादिता, आडम्बरों से जागरूक हो जाएं,
इस समाज की समस्या को मिल कर सुलझाएं,
हर एक के हित हेतु खुद को सजग बनाएं,
अवगुणों को त्याग कर सद्गुण अपनाएं,
प्रेम को इस संसार में व्यापक बनाएं,
खुद भी जियें इसके लिए,सबको जीना सिखाएं,
आओ सभी हम मिलकर यही गीत गुनगुनाएं।

                        -अनुराधा यादव